रियाज़ अख्तर शफीक, मारूफ़ आलम और खुर्शीद आलम ग़ालिब एकेडमी दिल्ली में नवाज़े गए
सीतामढ़ी : क़ौमी उर्दू शिक्षक कर्मचारी संघ के बैनर तले दिल्ली की अज़ीम इल्मी और अदबी दर्सगाह ग़ालिब एकेडमी में एक शानदार तक़रीब-ए-एज़ाज़ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में उर्दू ज़बान और अदब के ख़िदमतगुज़ारों तथा विभिन्न क्षेत्रों में अहम सेवाएं देने वाली शख्सियतों को एवार्ड और सम्मान से नवाज़ा गया। इस अवसर पर ख़ास तौर से रियाज़ अख्तर शफीक, मारूफ़ आलम और खुर्शीद आलम को उनकी ग़ैर मामूली सेवाओं के एतराफ़ में ख़ास सम्मान से नवाज़ा गया।
कार्यक्रम में दिल्ली और उसके आस-पास के अदीबों, शायरों, दानिश्वरों, असातिज़ा, समाजसेवियों और छात्रों ने बड़ी तादाद में शिरकत की। हॉल में मौजूद लोगों का जोश और उत्साह इस बात का गवाह था कि उर्दू ज़बान और अदब की सेवा करने वाली शख्सियतों की ताईद और हौसला-अफ़ज़ाई से समाज में नई ऊर्जा और जुनून पैदा होता है।
रियाज़ अख्तर शफीक को उनकी इल्मी और तालीमी सेवाओं के लिए ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया गया। वह कई बरसों से तालीमी मैदान में उर्दू ज़बान की तरव्वुज व इशाअत के लिए सक्रिय हैं और नई नस्ल को उर्दू की अदबी रिवायतों से जोड़ने में अहम किरदार अदा कर रहे हैं। उनकी तहरीरी और तन्कीदी तखलीक़ात ने उर्दू अदब के इल्मी ख़ज़ाने में अहम इज़ाफ़ा किया है। मुख़ातिबीन ने कहा कि रियाज़ अख्तर शफीक उर्दू ज़बान के सच्चे खिदमतगुज़ार हैं जिनकी ख़िदमात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
मारूफ़ आलम को भी उनके इल्मी और अदबी कारनामों के लिए सम्मानित किया गया। वह न सिर्फ़ तालीमी मैदान में बल्कि दीन व अदब के ख़ज़ाने को नई नस्ल तक पहुँचाने में भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ कोशिशें कर रहे हैं। उनकी दینی बसारत और तहक़ीक़ी काوشों ने उन्हें इल्मी हलक़ों में अहम मक़ाम बख्शा है। मुख़ातिबीन ने कहा कि मारूफ़ आलिम की सेवाएँ नौजवानों के लिए मशअल-ए-राह हैं और वह उर्दू के साथ-साथ इल्मी और अख़लाक़ी क़दर-ओ-क़ीमत को भी फ़रोग़ दे रहे हैं।
खुर्शीद आलम को उनकी समाजी और अदबी सेवाओं के लिए ख़ास तौर पर सराहा गया। वह उर्दू ज़बान को समाज के निचले तबक़े तक पहुँचाने और आम सतह पर इसके फ़रोग़ के लिए हमेशा कोशां हैं। उनकी तहरीरी और तक़रीरी सेवाओं ने उर्दू के आसान और आमफहम पैग़ाम को समाज तक पहुँचाने में अहम किरदार अदा किया है। मुख़ातिबीन ने उनके जज़्बा-ए-ख़िदमत को सलाम पेश किया और कहा कि ऐसे अफ़राद ही उर्दू के मुस्तक़बिल को रौशन बना सकते हैं।
इस दौरान अन्य शायरों और अदीबों ने भी उर्दू ज़बान की मौजूदा सुरत-ए-हाल, उसके मसाइल और इम्कानात पर इज़हार-ए-ख़याल किया। सब ने इस बात पर जोर दिया कि उर्दू सिर्फ़ एक ज़बान नहीं बल्कि एक तहज़ीबी विरसा है जिसे संरक्षित रखना हर उर्दू दोस्त की जिम्मेदारी है।




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